शिवा-बावनी – १ / Shiva Baavni – 1

The first of the 52; (बावनी)। We have an English and a हिन्दी translation. Scroll to the language of your choice.

This first verse is in the Manharn (मनहरण) metre.

We are very grateful to Shree Rajendra Chandrakant Rai, our Mentor & Advisor for teaching us the wonderful nuances, and helping us discover the beauty of Mahakavi Bhushan’s poetry.


 

साजि चतुरंग वीर रंग में तुरंग चढ़ि,
सरजा सिवाजी जंग जीतन चलत है ।
‘भूषण’ भनत नाद विहद नगारन के,
नदी नद मद गैबरन के रलत है ।।
ऐल फैल खैल-भैल खलक में गैल गैल,
गजन की ठेल पेल सैल उसलत है ।
तारा सो तरनि धूरि धारा में लगत जिमि,
थारा पर पारा पारावार यों हलत है ।


 

शब्दार्थ:

साजि = सजा कर । चतुरंग = चतुरंगिणी सेना अर्थात हाथी, घोड़े, रथ और पैदल । वीर रंग में = बड़ी बहादुरी के साथ । तुरंग = घोड़ा । जंग = लड़ाई । सरजा = सरेजाह (फ़ारसी शब्द) शिवाजी, यह मालोजी की उपाधि थी जो उन्हें अहमदनगर के दरबार में दी गई थी । सरेजाह का अर्थ है सर्वशिरोमणि। भनत या भणत = कहते हैं । नाद = आवाज़ । विहद = बेहद । गैबर = मत्त हाथी । रलत हैं = मिल जाते हैं । ऐल = भीड़, कोलाहल, चीख-पुकार । फैल = फैलने से । खैल-भैल = खलबली । गैल = रास्ता । तरनि = सूर्य । पारावार = समुद्र ।

भावार्थ:

अपनी चतुरंगिनी सेना को वीर रस मे सजाकर अर्थात उत्साह से परिपूर्ण कर शिवाजी महाराज युद्ध जीतने के लिये निकाल पड़े हैं। भूषण कवि कहते हैं की सेना के आगे-आगे अवशाल नगाड़ों को बजाया जा रहा है और युवा मतवाले हाथियों के कान से बनने वाले मद का परिणाम इतना अधिक है कि रास्ते के तमाम नदी-नाले मद से भर गाये हैं। हाथियों का काया इतनी विशाल है और उनकी संख्या भी इतनी अधिक है कि रास्ते संकरे से लगने लगे हैं। मतवाले हाथियों के चलने से और उनका धक्का लगने से, रास्ते के दोनों ओर जो पहाड़ खड़े हैं, वे उखड कर गिर रहे हैं। शिवाजी महाराज की विशाल सेना के चलने से इतनी धूल उड़ रही है कि आकाश पर पर्त ही छा गयी है। इस कारण से आसमान पर दमकता हुआ सूरज भी एक टिमटिमाते हुए तारे सा दिखने लगा है। सेना के बोझ के कारण पूरा संसार ऐसे डोल रहा है जैसे किसी विशाल थाली में रखा हुआ पारद पदार्थ इधर से उधर डोलता रहता है।

मद: “हाथी जब अपने युवाकाल में आता है तब कानों से एक द्रव पदार्थ लगता है। इसे ही मद कहते हैं। प्राचीनकाल में युवा हाथियों से ही युद्ध लड़ा जाता था। यहाँ पर वे कह रहे हैं की शिवजी जब अपनी सेना को लेकर आगे बढ़ते हैं तब हाथियों के कान से बहने वेक मद के कारण नदी-नाले भर गए हैं।”

काव्य सुषमा:

१। मनहरण छंद का उपयोग हुआ है। मनहरण छंद मे प्रत्येक चरण ३१ अक्षर का होता है। साधारणतः १६ और १५ अक्षरों पर विराम होता है और अन्त का अक्षर दीर्घ होता है।

२। अतिशयोक्ति अलंकार – “नदी नद मद गैबरन के रलत है”। जहां पर कवो द्वारा ऐसा वर्णन किया जाये जिस पर सहज रूप से विश्वास न हो सके और वह सांसारिक अर्थों में ग्रहण करने योग्य न लगता हो, तो वहां पर अतिशयोक्ति अलंकार होता है।

३। ध्वन्यात्मक सौंदर्य – कवि ने विशेष ध्वनि वाले वर्ण का प्रयोग करके कविता मे नाद-सौंदर्य उत्पन्न कर दिया है – “ऐल फैल खैल-भैल खलक में गैल गैल”

४। उपमा अलंकार – “तारा सो तरनि धूरि धारा में लगत जिमि, थारा पर पारा पारावार यों हलत है।” सूर्य तारे के समान चमकहीन हो गया है। संसार थाली पर रखे हुए पारे सा हिल रहा है।

५। विशेष: “तारा सो तरनि धूरि धारा में लगत जिमि”, यहां पर गुण दृश्यमान नहीं है, अर्थात वह विशेषता प्रदर्शित ही नहीं कि गयी है अत: यहां पर ‘लुप्तोपमा’ अलंकार है। जहां जार में से कोई अंग प्रदर्शित न हो, तो वहां पर लुप्तोपमा अलंकार कहा जाता है।


 

English Translation

साजि चतुरंग वीर रंग में तुरंग चढ़ि,
सरजा सिवाजी जंग जीतन चलत है ।
‘भूषण’ भनत नाद विहद नगारन के,
नदी नद मद गैबरन के रलत है ।।
ऐल फैल खैल-भैल खलक में गैल गैल,
गजन की ठेल पेल सैल उसलत है ।
तारा सो तरनि धूरि धारा में लगत जिमि,
थारा पर पारा पारावार यों हलत है ।

saaji chaturang veer rang mein turang chadhi,
saraja sivaajee jang jeetan chalat hai.
‘bhooshan’ bhanat naad vihad nagaaran ke,
nadee nad mad gaibaran ke ralat hai.
ail phail khail-bhail khalak mein gail-gail,
gajan kee thel pel sail usalat hai.
taara so tarani dhoori dhaara mein lagat jimi,
thaara par paara paaraavaar yon halat hai.


 

Word Meanings:

साजि (saaji) = decorated. चतुरंग (chaturang) = an army comprising of four units, viz. elephants, cavalry, chariots, and infantry. वीर रंग में (veer rang mein) = in brave or heroic form; spirit. तुरंग (turang) = horse. जंग = लड़ाई । सरजा (saraja; from sar-e-jah)= reference to Shivaji, Sar-e-jah was a title awarded to Maloji (Shivaji’s grandfather) in the Ahmednagar court. It means, diamond in the crown; refers to an eminent personality. भनत (bhanat) = says. नाद (naad) = sound. विहद = excessive; endless. गैबर (gaibaran) = periodic condition in male elephants, characterized by highly aggressive behavior and accompanied by a large rise in reproductive hormones. रलत हैं (ralat hai)= gets mixed with. ऐल (ail)= crowd, commotion. फैल (phail)= to spread. खैल-भैल (khail -bail)=chaos, disorder. गैल (gail) = road. तरनि (tarani) = the sun. पारावार (paaravaar) = the sea.

Essence:

The resplendent army of chariots, elephants, horses, and foot soldiers is adorned and decorated with bravery and heroic spirit. Shivaji mounts his horse to lead this army to win the war.

Bhushan says, the sounds of the kettle-drums are deafening and the young bull-elephants are secreting so much musth, that there are rivers and streams of them, flowing.

The elephants are spreading such commotion that there is chaos and disorder in the paths of the enemy, where this army treads. So thunderous is their movement that the hills along are being uprooted.

The feet and the hooves of this army raise so much dust that it covers the sky and the shining sun is reduced to but like a twinkling star. As the massive army marches through, the earth trembles like mercury on a wobbling plate.

See Musth | Temporin


 

An excellent rendition of this verse by Deepak Kabir

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7 thoughts on “शिवा-बावनी – १ / Shiva Baavni – 1

    1. Thank you for your comment. We plan to translate the entire compilation of 52 verses. Stay tuned. Subscribe so that you get updates, or follow us on Facebook and Twitter. 🙂

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  1. That was Great translation
    It tooks lots of effort
    Hats off to you
    Please let me know when you release the full text
    If possible let me know through whatsapp
    9552441760

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