शिवा-बावनी – २ / Shiva Baavni – 2

The second of the 52; (बावनी)। We have an English and a हिन्दी translation. Scroll to the language of your choice.

We are very grateful to Shree Rajendra Chandrakant Rai, our Mentor & Advisor for teaching us the wonderful nuances, and helping us discover the beauty of Mahakavi Bhushan’s poetry.


 

बाने फहराने घहराने घण्टा गजन के,
नाहीं ठहराने राव राने देस देस के।
नग भहराने ग्रामनगर पराने सुनि,
बाजत निसाने सिवराज जू नरेस के।।
हाथिन के हौदा उकसाने कुंभ कुंजर के,
भौन को भजाने अलि छूटे लट केस के।
दल के दरारे हुते कमठ करारे फूटे,
केरा के से पात बिगराने फन सेस के।।


 

बाने = झण्डे जो भालेदारों के भालों पर लगे रहते हैं। फहराने = उड़े। घहराने = भीषण आवाज़ होना। भहराने = हड़बड़ी में गिर जाना। पराने = भाग गये। निसान = भूषण जी के अर्थ में नगाड़े; घोड़ों पर नगाड़े वाले जो झण्डा रखते हैं उसे निशान कहते हैं। उकसाने = उकस गये, ढीले पड़ गये। कुम्भ = हाथी का सिर, घड़ा। कुंजर = हाथी। भौन = भवन या घर। दल = सेना। दरार = धमाक। कमठ = कछुआ। करारे = मज़बूत।

भावार्थ

भूषण कवि कहते हैं कि शिवाजी की सेना में भालों पर लगे हुए ध्वज फहराने लगे और हाथियों के गले में बंधे हुए घण्टों में ध्वनियां उत्पन्न होने लगीं। शिवाजी की इस पराक्रमी सेना के सम्मुख विभिन्न देशों के राजा-महाराज पल भर भी न ठहर सके अर्थात सेना का सामना कर पाने में समर्थ न हो सके। शिवाजी महाराज की सेना के चलने के कारण बड़े-बड़े पहाड हिलने-डुलने लगे हैं।गांव और नगरों के लोग पहाड़ो के खिसकने की आवाजें सुनकर इधर-उधर भागने लगे। शिवाजी महाराज की सेना के नगाड़ों के बजने से भी यही प्रभाव पड़ रहा था। शत्रु-सेना के हाथियों पर बंधे हुए हौदे उसी तरह खुल गये, जैसे हाथियों के उपर रखे युए घड़े हों।

शत्रु-देशों की स्त्रियां, ऐसे दृश्यों को देखकर जब अपने-अपने घरों की ओर भाग रही थीं, तब उनके सुंदर और घुंगराले केश हवा में इस तरह उड़ रहे थे, जैसे कि काले रंग के भौंरों के झुंड के झुंड उड़ रहे हों। शिवाजी की सेना के चलने से धरती पर जो धमक पैदा हो रही है, उसके कारण कछुए की मजबूत पींठ टूटने लगी है और शेषनाग के फनों की तो ऐसी दुर्दशा हो गयी है, जैसे केले के वृक्ष के पत्ते टूक-टूक हो रहे हों।

टिप्पणी

१। धार्मिक मान्यता के अनुसार पृथ्वी कछुए की पींठ और शेषनाग के फनों पर सखी हुई है।

२। कहीं कहीं उक्त छन्द के तीसरे चरण का इस प्रकार भी पाठान्तर है: — “हाथिन के हौदा लौं कसाने कुम्भ कुञ्जर के भौन के भजाने अलि! छूटे लट केस के” अर्थात हे अलि! (सखी) हाथियों के हौदे उनके मस्तक तक कसे रहगये, उन पर हम सवार न हो सकीं, और (भौन के भजाने) घर से भागते भागते हमारे सिर की सारी लटें खुल गई।

काव्य सुषमा

१। पूर्णोपमालंकार।
२। अतिशयोक्ति अलंकार।
३। पूरे पद में ध्वन्यात्मक सौंदर्य है।
४। कवि जे वर्णों के प्रयोग में अपने विशेष काव्य-कौशल को प्रकट किया है।


English Translation

बाने फहराने घहराने घण्टा गजन के,
नाहीं ठहराने राव राने देस देस के ।
नग भहराने ग्रामनगर पराने सुनि,
बाजत निसाने सिवराज जू नरेस के ।।
हाथिन के हौदा उकसाने कुंभ कुंजर के,
भौन को भजाने अलि छूटे लट केस के ।
दल के दरारे हुते कमठ करारे फूटे,
केरा के से पात बिगराने फन सेस के ।।

baane phaharaane gaharaane ghanta gajan ke,
nahin thaharane raav raane des des ke.
nag bhaharaane graamanagar paraane suni,
baajat nisaane sivaraaj joo nares ke.
haathin ke hauda ukasaane kumbh kunjar ke,
bhaun ko bhajaane ali chhoote lat kes ke.
dal ke daraare hute kamath karaare phoote,
kera ke se paat bigaraane phan ses ke.


 

Word Meanings

बाने = flags on spears; standard bearers. फहराने = flying; fluttering । घहराने = scary, loud noise. भहराने = suddenly, falling down. पराने = ran away. निसान = Ideally, this would imply a standard-bearer; nishānbardāri; however, the poet refers to a drum-carrying cavalry. Naqqārcī. उकसाने = loosened. कुम्भ = lit. pot; head of an elephant. कुंजर = elephant. भौन = home । दल = army. दरार = cracks; loud noise. कमठ = tortoise. करारे = hard; strong.

Essence

The poet continues; and as the army moves, bearing standards on their spears, the loud noise of the bells on the elephants intimidates the lords of the lands — the kings and the feudal lords — dare not stay in the path of the army.

The sound of the kettle-drums leading the army, shakes the foundations of the hills that lie along, the locals run helter-skelter as they feel the very earth-shaking under them.

This is the effect of the din that Shivaji’s army is causing. The howdah (an elephant’s saddle or carriage) of the enemy loosens and reaches the neck of the elephant. The women folk of the enemy, seeing this commotion, haste towards the safety of their homes, their hair loose from their braids, seem like a swarm of black bees headed to their hives.

Such a massive army rides the face of the earth that the back of the Tortoise is about to break. And the plight of the multi-headed serpent — Sheshnag — is such that its hoods are falling as if leaves of a banana tree are being hacked.

(Here, the poet refers to the classic myth of Samudra Manthan; churning of the Ocean of the Milk)

Poetic Beauty

  1. The simile has been used in it perfect form’ all four components of a simile have been used.
  2. Exaggerated metre has been employed in continuation of the previous verse.
  3. The verse employs an astounding sound quality and beauty.

संदर्भ / References

  1. पं॰ हरिशंकर शर्मा कविरत्न। शिवा-बावनी, टीका-टिप्पनी, अलंकार तथा प्रस्तावना सहित। आगरा: रामप्रसाद एण्ड ब्रदर्स
  2. आनन्द मिश्र ‘अभय’।। शिवा-बावनी, छत्रसाल दशक सहित। लकनऊ: लोकहित प्रकाशन। २०१२
  3. आचार्य विश्वनाथप्रसाद मिश्र। भूषण ग्रंथावली। नयी दिल्ली: वाणी प्रकाशन। २०१२।

Links

  1. http://www.bharat-rakshak.com/ARMY/images/Poona%20Horse.pdf
  2. http://mukesh-lakshya.blogspot.in/2012/07/2.html

 

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