शिवा-बावनी – ४ / Shiva Baavni – 4

The fourth of the 52; (बावनी)। We have an English and a हिन्दी translation. Scroll to the language of your choice.

We are very grateful to Shree Rajendra Chandrakant Rai, our Mentor & Advisor for teaching us the wonderful nuances, and helping us discover the beauty of Mahakavi Bhushan’s poetry.


बद्दल न होंहिं दल दच्छिन घमंड माँहिं,
घटा हू न होहि दल सिवाजी हँकारी के ।
दामिनी दमंक नाहि खुले खग्ग विरन के,
वीर सिर छाप लखु तीजा असवारी के ।।
देखि देखि मुगलों की हरमैं भवन त्यागैं,
उझकि उझकि उठैं बहत बयारी के ।
दिल्ली मति भूली कहैं बात घन घोर घोर,
बाजत नगारे जे सितारे गढ़ धारी के ।।


शब्दार्थ

बद्दल = बादल। हँकारी = घमण्डी, अहंकारी। दामिनी = बिजली। दमंक = दमाक, चमक। खग्ग = खङ्ग, खांड़ा (तलवार)। सिर छाप = साफ़े के ऊपर, सामने की ओर वीर सिपाही भाँति-भाँति के सुन्दर चमकदार चिन्ह (छाप) लगा लेते थे। तीजा असवारी = हरितालिका तीज। हरमैं = परदे में रहनेवाली स्त्रियाँ, बेगमें। उझकि उठना = चौंक जाना। बयारी = वायु। मति भूली = भ्रम में पड़ी। सितारे गढ़ धारी = सितारे के किले का स्वामी, शिवाजी।

भावार्थ

कवि भूषण कहते हैं कि शिवाजी के पराक्रम का ऐसा प्रभाव है कि उनके शत्रुओं में आशंकाओं के कारण सदैव ही, संदेह और भ्रम का वातावरण बना रहता है। आकाश में जब बादल गर्जना करते हैं तो उन्हें लगता है कि शिवाजी की सेना अपनी वीरता के अभिमान में गर्जना कर रही है। काले-काले बादलों से युक्त घटाएं जब उमड़ती हैं तो, उन्हें ऐसा प्रतीत होता है कि शिवाजी की सेना के चलने के कारण आकाष में धूल के बादल उमड़ पड़े हैं। आकाष में बिजली की चमक को शत्रुदल, शिवाजी के सैनिकों की खुली हुई तलवारें ही समझ लेते हैं और उन्हें ऐसा प्रतीत होता है कि वीर सैनिक अपने सिरों पर बंधे हुए भांति-भांति के सुंदर और चमकदार चिन्हों को धारण किये हुए हैं। राजपूताने में हरितालिका के दिन राजाओं और सैनिकों की सवारियां इसी तरह से सज-धजकर निकला करती हैं।

इन सब दृश्यों को देखकर मुगलों की स्त्रियां भी भयभीत हो गयी हैं, और अपने-अपने महलों से इधर-उधर भाग रहीं हैं। हवा के तेज झोंको के चलने पर वे चौंक पडती हैं। कवि कगते हैं कि दिल्ली के बादशाह की तो अक्ल ही मारी गयी है। वह महाराज शिवाजी की सेनाओं के नगाड़ों की आवाज़ सुनकर अकर्मण्य ही हो जाता है।

काव्य सुषमा

  1. शुद्ध अपन्हुति अलंकार
  2. संदेह अलंकार
  3. अनुप्रास अलंकार
  4. अतिशयोक्ति अलंकार
  5. ‘अक्ल मारी जाना’ मुहावरे का प्रयोग हुआ है।

English Translation


Baddala na hōnhiṁ dala dacchina ghamaṇḍa māhiṁ,
ghaṭā hū na hōhi dala sivājī hankārī kē.
Dāminī damaṅka nāhi khulē khagga virana kē,
vīra sira chāpa lakhu tījā asavārī kē.
Dēkhi dēkhi mugalōṁ kī haramaiṁ bhavana tyāgaiṁ,
ujhaki ujhaki uṭhaiṁ bahata bayārī kē.
Dillī mati bhūlī kahaiṁ bāta ghana ghōra ghōra,
bājata nagārē jē sitārē gaṛha dhārī kē.


Word Meanings

बद्दल = cloud. हँकारी = proud, egoistic. दामिनी = lightening. दमंक = shine। खग्ग = khanda is a double-edge straight sword. सिर छाप = emblem, crest, decoration on the turban/head-dress. तीजा असवारी = Teej, a generic festival name. हरमैं = harems; members of a harem. उझकि उठना = bewildered; confounded. बयारी = wind. मति भूली = to lose one’s senses सितारे गढ़ धारी = lord of the fort, i.e. Shivaji

Essence

Kavi Bhushan describes, that the effect of Shivaji’s valour is such that his enemies are in a constant state of doubt and fear. When there’s thunder, they sense that it is Shivaji’s brave army that is approaching them. When the sky darkens with rain clouds, they assume it to the dust raised into sky, by the march of Shivaji’s armies, that blankets the sun. When lightning strikes they assume it to be the reflection of the swords brandished by the soldiers and the emblems on their head-dress.

Seeing these sights, the women in the harems run helter-skelter from palace to palace. Even the gusts of wind confound them. The regent of Delhi loses his senses when hears the sounds of Shivaji’s kettle-drums.

संदर्भ / References

  1. पं॰ हरिशंकर शर्मा कविरत्न। शिवा-बावनी, टीका-टिप्पनी, अलंकार तथा प्रस्तावना सहित। आगरा: रामप्रसाद एण्ड ब्रदर्स
  2. आनन्द मिश्र ‘अभय’।। शिवा-बावनी, छत्रसाल दशक सहित। लकनऊ: लोकहित प्रकाशन। २०१२
  3. आचार्य विश्वनाथप्रसाद मिश्र। भूषण ग्रंथावली। नयी दिल्ली: वाणी प्रकाशन। २०१२।

Nagada / Kettle-drums. Image Courtesy Samir Pathak. Taken at Saswad, MH, India
Nagada / Kettle-drums. Image Courtesy Samir Pathak. Taken at Saswad, MH, India
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शिवा-बावनी – ३ / Shiva Baavni – 3

The third of the 52; (बावनी)। We have an English and a हिन्दी translation. Scroll to the language of your choice.

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प्रेतिनी पिशाचऽरु निसाचर निसाचरिहु,
मिलि मिलि आपुस में गावत बधाई हैं।
भैरौं भूत प्रेत भूरि भूधर भयंकर से,
जुत्थ जुत्थ जोगिनी जमात जुरिआई हैं।।
किलकि किलकि कै कुतूहल करति काली,
डिम डिम डमरू दिगम्बर बजाई है।
सिवा पूँछै सिव सौ समाज आजु कहाँ जली,
काहू पै सिवा नरेस भृकुटी चढाई है।।

शब्दार्थ:

भूरि = बहुत। भूधर = पहाड़। जुत्थ = समुदाय। जमात = संघ, झुण्ड। कुतूहल = तमाशा। दिगम्बर = महादेव। डिम डिम = डमरू बजने का शब्द। भृकुटी चढाई है = क्रोध किया है। शिवा = पार्वती। शिव = महादेव।

भावार्थ:

महाराज शिवाजी के द्वारा युद्ध की घोषणा करते ही तमाम प्रेतिनी, पिशाच, राक्शस-राक्शसनियां, भैरव-भूत, काली आदि सभी आनंद से उछल रहे हैं। वे एक-दूसरे के गलो लगकर बधाई-गीत गा रहे हैं। एक से एक भयंकर भूत-पिशाच और जोगिनीयों के झुण्ड के झुण्ड जमा हो रहे हैं। देवि कालिका किलकारियां लगाकर अपने हृदय की उत्सुकता को प्रकट कर रही हैं। और स्वयं शिव, जो ध्वंस के देवता हैं, प्रसन्नतापूर्वक अपना डमरु बजा रहे हैं। ऐसा वातावरण इसलिये बन गया है, क्योंकि सभी को यह आशा हो गयी है कि शिवाजी महराज रण-भूमि में पहुंचकर इतना नर-संहार करेंगे कि वे सब मांस खाकर और रक्त पीकर तृप्त हो जायेंगे।

शिव की पत्नीपार्वती देवि शिव से पूछ रहीं हैं कि यह सेना आज कहां जा रही है? क्या छत्रपति शिवाजी महराज की भृकुटी किसी पर टेढ़ी हो गयी है।

काव्य सुषमा:

१। अप्रस्तुत प्रशंसा अलंकार। इसे ब्याज स्तुति अलंकार भी कहते हैं।
२। पद में अनेक स्थलों पर अनुप्रास अलंकार है, क्योंकि एक ही वर्ण की आवृति एकाधिक बार हुई है।
३। पद में वीर रस है।
४। बुंदेली भाषा में पद रचना की गयी है।

English Translation:

pretinee pishaacharu nisaachar nisaacharihu,
mili mili aapus mein gaavat badhaee hain.
bhairaun bhoot pret bhoori bhoodhar bhayankar se,
jutth jutth joginee jamaat juriaee hain.
kilaki kilaki kai kutoohal karati kaalee,
dim dim damaroo digambar bajaee hai.
siva poonchhai siv sau samaaj aaju kahaan jalee,
kaahoo pai siva nares bhrkutee chadhaee hai.

Word Meanings:

भूरि = much, very. भूधर = mountain, जुत्थ = group, army. जमात = group, crowd. कुतूहल = specticle, frolic; also curiosity. दिगम्बर = Lord Shiva डिम डिम = the sound of a damru भृकुटी चढाई है = raised an eyebrow (depicting annoyance) शिवा = Parvati, Lord Shiva’s wife शिव = Lord Shiva.

Essence:

Shivaji’s declaration of war has all the denizens of the netherworld in great excitement. Goblins, ghosts, devils, demons, and hell hounds alike are dancing with joy. They are in full embrace, greeting each other, celebrating.  Groups of these scary, mountain-like dwellers of the infernal world are merging into one crowd. Their happiness is because Shivaji is leading his army to the battle-field, and there will be death and destruction of the evil forces. The inhabitants of hell, will today feast on the flesh and blood of the dead. Goddess Kali is excited by this spectacle; she shows eager interest (since her purpose: the destruction of evil, will be fulfilled). Lord Shiva; the God of Destruction, plays the damru in continuous litany.

Parvati, Lord Shiva’s wife, asks where is this army of Shivaji headed? Who has incurred Shivaji’s wrath?

(In the verse, the poet uses a phrase that literally means, “caused Shivaji’s eyebrow to be raised” — implying irritation or annoyance, however describes the scene beforehand of destruction of enormous proportions.)

Poetic Beauty:

  1. This verse employs a type of metaphor in which the tenor is missing. Another quality is that it employs ब्याज स्तुति अलंकार – a figure of speech where blame, or negative connotations are used to praise someone or something.
  2. There is significant use of alliteration throughout the verse.
  3. The heroic metre in exaggerated form continues from the previous verses.
  4. The verse uses many words from the Bundelkhand region.

संदर्भ / References

  1. पं॰ हरिशंकर शर्मा कविरत्न। शिवा-बावनी, टीका-टिप्पनी, अलंकार तथा प्रस्तावना सहित। आगरा: रामप्रसाद एण्ड ब्रदर्स
  2. आनन्द मिश्र ‘अभय’।। शिवा-बावनी, छत्रसाल दशक सहित। लकनऊ: लोकहित प्रकाशन। २०१२
  3. आचार्य विश्वनाथप्रसाद मिश्र। भूषण ग्रंथावली। नयी दिल्ली: वाणी प्रकाशन। २०१२।

Featured Image: By Mir Muhammad [Public domain], via Wikimedia Commons and Shilpi Awasthi

शिवा-बावनी – २ / Shiva Baavni – 2

The second of the 52; (बावनी)। We have an English and a हिन्दी translation. Scroll to the language of your choice.

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बाने फहराने घहराने घण्टा गजन के,
नाहीं ठहराने राव राने देस देस के।
नग भहराने ग्रामनगर पराने सुनि,
बाजत निसाने सिवराज जू नरेस के।।
हाथिन के हौदा उकसाने कुंभ कुंजर के,
भौन को भजाने अलि छूटे लट केस के।
दल के दरारे हुते कमठ करारे फूटे,
केरा के से पात बिगराने फन सेस के।।


 

बाने = झण्डे जो भालेदारों के भालों पर लगे रहते हैं। फहराने = उड़े। घहराने = भीषण आवाज़ होना। भहराने = हड़बड़ी में गिर जाना। पराने = भाग गये। निसान = भूषण जी के अर्थ में नगाड़े; घोड़ों पर नगाड़े वाले जो झण्डा रखते हैं उसे निशान कहते हैं। उकसाने = उकस गये, ढीले पड़ गये। कुम्भ = हाथी का सिर, घड़ा। कुंजर = हाथी। भौन = भवन या घर। दल = सेना। दरार = धमाक। कमठ = कछुआ। करारे = मज़बूत।

भावार्थ

भूषण कवि कहते हैं कि शिवाजी की सेना में भालों पर लगे हुए ध्वज फहराने लगे और हाथियों के गले में बंधे हुए घण्टों में ध्वनियां उत्पन्न होने लगीं। शिवाजी की इस पराक्रमी सेना के सम्मुख विभिन्न देशों के राजा-महाराज पल भर भी न ठहर सके अर्थात सेना का सामना कर पाने में समर्थ न हो सके। शिवाजी महाराज की सेना के चलने के कारण बड़े-बड़े पहाड हिलने-डुलने लगे हैं।गांव और नगरों के लोग पहाड़ो के खिसकने की आवाजें सुनकर इधर-उधर भागने लगे। शिवाजी महाराज की सेना के नगाड़ों के बजने से भी यही प्रभाव पड़ रहा था। शत्रु-सेना के हाथियों पर बंधे हुए हौदे उसी तरह खुल गये, जैसे हाथियों के उपर रखे युए घड़े हों।

शत्रु-देशों की स्त्रियां, ऐसे दृश्यों को देखकर जब अपने-अपने घरों की ओर भाग रही थीं, तब उनके सुंदर और घुंगराले केश हवा में इस तरह उड़ रहे थे, जैसे कि काले रंग के भौंरों के झुंड के झुंड उड़ रहे हों। शिवाजी की सेना के चलने से धरती पर जो धमक पैदा हो रही है, उसके कारण कछुए की मजबूत पींठ टूटने लगी है और शेषनाग के फनों की तो ऐसी दुर्दशा हो गयी है, जैसे केले के वृक्ष के पत्ते टूक-टूक हो रहे हों।

टिप्पणी

१। धार्मिक मान्यता के अनुसार पृथ्वी कछुए की पींठ और शेषनाग के फनों पर सखी हुई है।

२। कहीं कहीं उक्त छन्द के तीसरे चरण का इस प्रकार भी पाठान्तर है: — “हाथिन के हौदा लौं कसाने कुम्भ कुञ्जर के भौन के भजाने अलि! छूटे लट केस के” अर्थात हे अलि! (सखी) हाथियों के हौदे उनके मस्तक तक कसे रहगये, उन पर हम सवार न हो सकीं, और (भौन के भजाने) घर से भागते भागते हमारे सिर की सारी लटें खुल गई।

काव्य सुषमा

१। पूर्णोपमालंकार।
२। अतिशयोक्ति अलंकार।
३। पूरे पद में ध्वन्यात्मक सौंदर्य है।
४। कवि जे वर्णों के प्रयोग में अपने विशेष काव्य-कौशल को प्रकट किया है।


English Translation

बाने फहराने घहराने घण्टा गजन के,
नाहीं ठहराने राव राने देस देस के ।
नग भहराने ग्रामनगर पराने सुनि,
बाजत निसाने सिवराज जू नरेस के ।।
हाथिन के हौदा उकसाने कुंभ कुंजर के,
भौन को भजाने अलि छूटे लट केस के ।
दल के दरारे हुते कमठ करारे फूटे,
केरा के से पात बिगराने फन सेस के ।।

baane phaharaane gaharaane ghanta gajan ke,
nahin thaharane raav raane des des ke.
nag bhaharaane graamanagar paraane suni,
baajat nisaane sivaraaj joo nares ke.
haathin ke hauda ukasaane kumbh kunjar ke,
bhaun ko bhajaane ali chhoote lat kes ke.
dal ke daraare hute kamath karaare phoote,
kera ke se paat bigaraane phan ses ke.


 

Word Meanings

बाने = flags on spears; standard bearers. फहराने = flying; fluttering । घहराने = scary, loud noise. भहराने = suddenly, falling down. पराने = ran away. निसान = Ideally, this would imply a standard-bearer; nishānbardāri; however, the poet refers to a drum-carrying cavalry. Naqqārcī. उकसाने = loosened. कुम्भ = lit. pot; head of an elephant. कुंजर = elephant. भौन = home । दल = army. दरार = cracks; loud noise. कमठ = tortoise. करारे = hard; strong.

Essence

The poet continues; and as the army moves, bearing standards on their spears, the loud noise of the bells on the elephants intimidates the lords of the lands — the kings and the feudal lords — dare not stay in the path of the army.

The sound of the kettle-drums leading the army, shakes the foundations of the hills that lie along, the locals run helter-skelter as they feel the very earth-shaking under them.

This is the effect of the din that Shivaji’s army is causing. The howdah (an elephant’s saddle or carriage) of the enemy loosens and reaches the neck of the elephant. The women folk of the enemy, seeing this commotion, haste towards the safety of their homes, their hair loose from their braids, seem like a swarm of black bees headed to their hives.

Such a massive army rides the face of the earth that the back of the Tortoise is about to break. And the plight of the multi-headed serpent — Sheshnag — is such that its hoods are falling as if leaves of a banana tree are being hacked.

(Here, the poet refers to the classic myth of Samudra Manthan; churning of the Ocean of the Milk)

Poetic Beauty

  1. The simile has been used in it perfect form’ all four components of a simile have been used.
  2. Exaggerated metre has been employed in continuation of the previous verse.
  3. The verse employs an astounding sound quality and beauty.

संदर्भ / References

  1. पं॰ हरिशंकर शर्मा कविरत्न। शिवा-बावनी, टीका-टिप्पनी, अलंकार तथा प्रस्तावना सहित। आगरा: रामप्रसाद एण्ड ब्रदर्स
  2. आनन्द मिश्र ‘अभय’।। शिवा-बावनी, छत्रसाल दशक सहित। लकनऊ: लोकहित प्रकाशन। २०१२
  3. आचार्य विश्वनाथप्रसाद मिश्र। भूषण ग्रंथावली। नयी दिल्ली: वाणी प्रकाशन। २०१२।

Links

  1. http://www.bharat-rakshak.com/ARMY/images/Poona%20Horse.pdf
  2. http://mukesh-lakshya.blogspot.in/2012/07/2.html

 

शिवा-बावनी – १ / Shiva Baavni – 1

The first of the 52; (बावनी)। We have an English and a हिन्दी translation. Scroll to the language of your choice.

This first verse is in the Manharn (मनहरण) metre.

We are very grateful to Shree Rajendra Chandrakant Rai, our Mentor & Advisor for teaching us the wonderful nuances, and helping us discover the beauty of Mahakavi Bhushan’s poetry.


 

साजि चतुरंग वीर रंग में तुरंग चढ़ि,
सरजा सिवाजी जंग जीतन चलत है ।
‘भूषण’ भनत नाद विहद नगारन के,
नदी नद मद गैबरन के रलत है ।।
ऐल फैल खैल-भैल खलक में गैल गैल,
गजन की ठेल पेल सैल उसलत है ।
तारा सो तरनि धूरि धारा में लगत जिमि,
थारा पर पारा पारावार यों हलत है ।


 

शब्दार्थ:

साजि = सजा कर । चतुरंग = चतुरंगिणी सेना अर्थात हाथी, घोड़े, रथ और पैदल । वीर रंग में = बड़ी बहादुरी के साथ । तुरंग = घोड़ा । जंग = लड़ाई । सरजा = सरेजाह (फ़ारसी शब्द) शिवाजी, यह मालोजी की उपाधि थी जो उन्हें अहमदनगर के दरबार में दी गई थी । सरेजाह का अर्थ है सर्वशिरोमणि। भनत या भणत = कहते हैं । नाद = आवाज़ । विहद = बेहद । गैबर = मत्त हाथी । रलत हैं = मिल जाते हैं । ऐल = भीड़, कोलाहल, चीख-पुकार । फैल = फैलने से । खैल-भैल = खलबली । गैल = रास्ता । तरनि = सूर्य । पारावार = समुद्र ।

भावार्थ:

अपनी चतुरंगिनी सेना को वीर रस मे सजाकर अर्थात उत्साह से परिपूर्ण कर शिवाजी महाराज युद्ध जीतने के लिये निकाल पड़े हैं। भूषण कवि कहते हैं की सेना के आगे-आगे अवशाल नगाड़ों को बजाया जा रहा है और युवा मतवाले हाथियों के कान से बनने वाले मद का परिणाम इतना अधिक है कि रास्ते के तमाम नदी-नाले मद से भर गाये हैं। हाथियों का काया इतनी विशाल है और उनकी संख्या भी इतनी अधिक है कि रास्ते संकरे से लगने लगे हैं। मतवाले हाथियों के चलने से और उनका धक्का लगने से, रास्ते के दोनों ओर जो पहाड़ खड़े हैं, वे उखड कर गिर रहे हैं। शिवाजी महाराज की विशाल सेना के चलने से इतनी धूल उड़ रही है कि आकाश पर पर्त ही छा गयी है। इस कारण से आसमान पर दमकता हुआ सूरज भी एक टिमटिमाते हुए तारे सा दिखने लगा है। सेना के बोझ के कारण पूरा संसार ऐसे डोल रहा है जैसे किसी विशाल थाली में रखा हुआ पारद पदार्थ इधर से उधर डोलता रहता है।

मद: “हाथी जब अपने युवाकाल में आता है तब कानों से एक द्रव पदार्थ लगता है। इसे ही मद कहते हैं। प्राचीनकाल में युवा हाथियों से ही युद्ध लड़ा जाता था। यहाँ पर वे कह रहे हैं की शिवजी जब अपनी सेना को लेकर आगे बढ़ते हैं तब हाथियों के कान से बहने वेक मद के कारण नदी-नाले भर गए हैं।”

काव्य सुषमा:

१। मनहरण छंद का उपयोग हुआ है। मनहरण छंद मे प्रत्येक चरण ३१ अक्षर का होता है। साधारणतः १६ और १५ अक्षरों पर विराम होता है और अन्त का अक्षर दीर्घ होता है।

२। अतिशयोक्ति अलंकार – “नदी नद मद गैबरन के रलत है”। जहां पर कवो द्वारा ऐसा वर्णन किया जाये जिस पर सहज रूप से विश्वास न हो सके और वह सांसारिक अर्थों में ग्रहण करने योग्य न लगता हो, तो वहां पर अतिशयोक्ति अलंकार होता है।

३। ध्वन्यात्मक सौंदर्य – कवि ने विशेष ध्वनि वाले वर्ण का प्रयोग करके कविता मे नाद-सौंदर्य उत्पन्न कर दिया है – “ऐल फैल खैल-भैल खलक में गैल गैल”

४। उपमा अलंकार – “तारा सो तरनि धूरि धारा में लगत जिमि, थारा पर पारा पारावार यों हलत है।” सूर्य तारे के समान चमकहीन हो गया है। संसार थाली पर रखे हुए पारे सा हिल रहा है।

५। विशेष: “तारा सो तरनि धूरि धारा में लगत जिमि”, यहां पर गुण दृश्यमान नहीं है, अर्थात वह विशेषता प्रदर्शित ही नहीं कि गयी है अत: यहां पर ‘लुप्तोपमा’ अलंकार है। जहां जार में से कोई अंग प्रदर्शित न हो, तो वहां पर लुप्तोपमा अलंकार कहा जाता है।


 

English Translation

साजि चतुरंग वीर रंग में तुरंग चढ़ि,
सरजा सिवाजी जंग जीतन चलत है ।
‘भूषण’ भनत नाद विहद नगारन के,
नदी नद मद गैबरन के रलत है ।।
ऐल फैल खैल-भैल खलक में गैल गैल,
गजन की ठेल पेल सैल उसलत है ।
तारा सो तरनि धूरि धारा में लगत जिमि,
थारा पर पारा पारावार यों हलत है ।

saaji chaturang veer rang mein turang chadhi,
saraja sivaajee jang jeetan chalat hai.
‘bhooshan’ bhanat naad vihad nagaaran ke,
nadee nad mad gaibaran ke ralat hai.
ail phail khail-bhail khalak mein gail-gail,
gajan kee thel pel sail usalat hai.
taara so tarani dhoori dhaara mein lagat jimi,
thaara par paara paaraavaar yon halat hai.


 

Word Meanings:

साजि (saaji) = decorated. चतुरंग (chaturang) = an army comprising of four units, viz. elephants, cavalry, chariots, and infantry. वीर रंग में (veer rang mein) = in brave or heroic form; spirit. तुरंग (turang) = horse. जंग = लड़ाई । सरजा (saraja; from sar-e-jah)= reference to Shivaji, Sar-e-jah was a title awarded to Maloji (Shivaji’s grandfather) in the Ahmednagar court. It means, diamond in the crown; refers to an eminent personality. भनत (bhanat) = says. नाद (naad) = sound. विहद = excessive; endless. गैबर (gaibaran) = periodic condition in male elephants, characterized by highly aggressive behavior and accompanied by a large rise in reproductive hormones. रलत हैं (ralat hai)= gets mixed with. ऐल (ail)= crowd, commotion. फैल (phail)= to spread. खैल-भैल (khail -bail)=chaos, disorder. गैल (gail) = road. तरनि (tarani) = the sun. पारावार (paaravaar) = the sea.

Essence:

The resplendent army of chariots, elephants, horses, and foot soldiers is adorned and decorated with bravery and heroic spirit. Shivaji mounts his horse to lead this army to win the war.

Bhushan says, the sounds of the kettle-drums are deafening and the young bull-elephants are secreting so much musth, that there are rivers and streams of them, flowing.

The elephants are spreading such commotion that there is chaos and disorder in the paths of the enemy, where this army treads. So thunderous is their movement that the hills along are being uprooted.

The feet and the hooves of this army raise so much dust that it covers the sky and the shining sun is reduced to but like a twinkling star. As the massive army marches through, the earth trembles like mercury on a wobbling plate.

See Musth | Temporin


 

An excellent rendition of this verse by Deepak Kabir

शिवा-बावनी / Shiva Baavni

The opening verse of the 52; (बावनी)। We have an English and a हिन्दी translation. Scroll to the language of your choice.

This verse is a Chhappay (छप्पय) – in its simplest form, a six line verse. But there’s more to it, which we will cover in another post.

We are very grateful to Shree Rajendra Chandrakant Rai, our Mentor & Advisor for teaching us the wonderful nuances, and helping us discover the beauty of Mahakavi Bhushan’s poetry.


(१)

कौन करै बस वस्तु कौन यहि लोक बड़ो अति।
को साहस को सिन्धु कौन रज लाज धरे मति।।
को चकवा को सुखद बसै को सकल सुमन महि।
अष्ट सिद्धि नव निद्धि देत माँगे को सो कहि।।

जग बूझत उत्तर देत इमि, कवि भूषण कवि कुल सचिव।
दच्छिन नरेस सरजा सुभट साहिनंद मकरंद सिव।।

*

(1)

Who has the power to conquer all; who is the greatest of them all?
Who is the ocean of courage; who is consumed by the thought of protecting the motherland?
Who offers bliss to the Chakrawaak; who resides in every flower-like innocent souls?
Who, in this world grants Ashtasiddhi and Navnidhi?

The world seeks answers, and I, the minister of the poets’ clan, answer thus,
He is the ruler of the Deccan, the great warrior, son of Shahaji, grandson of Maloji, i.e. Shivaji.


Hindi & English Translations follow.


शब्दार्थ / Word Meanings

सिन्धु = समुद्र; ocean or sea । रज = मिट्टी; mud, earth । सुमन = फूल; flower । इमि = इस प्रकार; this way । सचिव = मन्त्री; minister, secretary । सुभट = बहुत बड़ा योद्धा या वीर; great warrior

भावार्थ

संसार जानना चाहता है, कि वह कौन व्यक्ति है जो किसी वस्तु को अपने वश में कर सकता है, और वह कौन है जो इस पृथ्वी-लोक में सबसे महान है? साहस का समुद्र कौन है, और वह कौन है जो अपनी जन्मभूमी की माटी की लाज की रक्षा करने का विचार सदैव अपने मन में रखे रहता है? चक्रवाक पक्षी को सुख प्रदान करने वाला कौन है? धरती के समस्त सात्विक-मनों में कौन बसा हुआ है? मांगते ही जो आठों प्रकार की सिद्धयां और नवों प्रकार की निधियों से परिपूर्ण बना देने का सामर्थ्य रखता है, वह कौन है?

इन सभी प्रश्नों को जानने की उत्कट आकांक्षा संसार के मन में उत्पन्न हो गयी है। इसलिये कवियों के कुल के सचिव भूषण कवि, सभी प्रष्नों का उत्तर इस प्रकार देते है − वे है दक्षिण के राजा, मनुष्यों में सर्वोत्कृष्ट एवं साहजी के कुल में जो उसी तरह उत्पन्न हुए हैं, जैसे फूलों में सुगंध फैलाने वाला पराग उत्पन्न होता है, अर्थात शिवाजी महाराज। शिवाजी के दादा, मालोजी को मालमकरन्द भी कहा जाता था।

टिप्पणी

  1. शिवाजी का शौर्य सूर्य समान दमकता है और चकवा पक्षी अपनी मादा से सूर्य-प्रकाश में ही मिलन कर सकता है। शिवाजी का शौर्य-सूर्य रात-दिन चमकता रहता है, इसलिये चकवा पक्षी को अब रात के आने का भय ही नहीं रहा, अतः वह सुख के सागर में डूबा हुआ हे।
  2. अष्टसिद्धियां ये हैं:
    1. अणिमा: अपने को सूक्ष्म बना लेने की क्षमता
    2. महिमा: अपने को बड़ा बना लेने की क्षमता
    3. गरिमा: अपने को भारी बना लेने की क्षमता
    4. लघिमा: अपने को हल्का बना लेने की क्षमता
    5. प्राप्ति: कुछ भी निर्माण कर लेने की क्षमता
    6. प्रकाम्य: कोई भी रूप धारण कर लेने की क्षमता
    7. ईशित्व: हर सत्ता को जान लेना और उस पर नियंत्रण करना
    8. वैशित्व: जीवन और मृत्यु पर नियंत्रण पा लेने की क्षमता
  3. नवनिधियां ये हैं: महापद्म, पद्म, शंख, मकर, कच्छप, मुकुन्द, कुन्द, नील और खर्ब।

काव्य-सुशमा और वैषिश्ट

  1. “साहस को सिंधु” तथा “मकरंद सिव” में, रूपक अलंकार है, क्योंकि शिवाजी को साहस का समुद्र बताया गया है। अन्य पंक्ति में शिवाजी महाराज को मकरंद ही बना दिया गया है। जहां उपमेय, अर्थात जिसका वर्णन किया जा रहा हो (शिवाजी), को उपमान ही बना दिया जाये (समुद्र) तो वहां पर रूपक अलंकार होता है।
  2. “सुमन” में श्लेष अलंकार है। जहां पर एक ही शब्द में दो अर्थ जुड़ें हुए हों, वहां पर श्लेष अलंकार होता है। सुमन का एक अर्थ है – पुश्प; दूसरा है – सु-मन, या सात्विक-मन।
  3. “सरजा सुभट साहिनंद” – अनुप्रास अलंकार है। जहां पर एक ही वर्ण की आवृत्ति एकाधिक बार होती है, वहां पर अनुप्रास अलंकार होता है। यहां पर ‘स’ वर्ण की आवृत्ति तीन बार हुई है।
  4. काव्य को पहेली-षैली में लिखा गया है।
  5. अतिश्योक्ति पूर्ण वर्णन करना राज्याश्रित कवियों की परंपरा रही है। राज-दरबारों में ऐसे ही वर्णन पसंद किये जाते थे। भूषण ने भी उसी परंपरा का पालन किया – “अष्ट सिद्धि नव निद्धि देत माँगे को सो कहि?”

Essence

The world wants to know who can control, master any thing in this world? Who is the greatest, supreme, in this world? Who has the courage that is as vast as the ocean itself? Who is the one continuously consumed by the thought of protecting the motherland? Who offers bliss to the Chakrawaak1 bird? Who has the mind share of all the innocent, pure-hearted souls? Who, in this world, has the power to grant Ashttasiddhi2 and Navnidhi3, by mere asking?

The entire world is eager to know the answers to these questions. And then the poet, Mahakavi Bhushan, proclaiming himself as the minister of the clan of poets, rises to give the answer to these questions, and says “This is how I answer all the questions” — He is the king of the Deccan. The fearless and the noblest of them all, son of Shahaji, grandson of Maloji. He is Shivaji. (In the poem, the poet uses the word Dakshin (दक्षिण; दच्छिन) or South; the source of the word Deccan)

There are two puns in the last line. Makarand is used as if to mean (a) nectar of flowers, and (b) the grandson of Maloji (who was also called Mal Makarand). The last word Shiv, is used as a reference to (a) Lord Shiva and (b) Chh. Shivaji.

Footnotes

  1. Shivaji’s valour and heroism is comparable to the sun. This comparison is not explicitly mentioned in the verse. The poet refers to the Chakwa or the Chakrawak bird to embellish this simile. Chakwa, or Ruddy Shelduck (Tadorna ferruginea), is known in India as the Brahminy Duck. It is said that the male and female separate at night and are reunited when the sun rises. Shivaji’s presence provides continuous “sunlight” and the birds are never separated, and are blissful.
  2. Ashta Siddhis are eight (probably Puranic) perfections, or super-natural powers. These are:
    1. Aṇimā: reducing one’s body even to the size of an atom;
    2. Mahima: expanding one’s body to an infinitely large size;
    3. Garima: becoming infinitely heavy;
    4. Laghima: becoming almost weightless;
    5. Prāpti: having unrestricted access to all places;
    6. Prākāmya: realising whatever one desires;
    7. Iṣṭva: possessing absolute lordship;
    8. Vaśtva: the power to subjugate all. [See Wiki Link below]
  3. Nav Nidhis are nine treasures. They are said to belong to Kuber, the God of wealth. These are:
    1. Mahapadma: lake double the size of padma in Himalaya with minerals and jewels
    2. Padma: lake in Himalaya with minerals and jewels
    3. Shankha: conch shell
    4. Makara: synonym of Padmini, black antimony
    5. Kachchhapa: tortoise or turtle shell
    6. Kumud: cinnabar, or quicksilver
    7. Kunda: arsenic
    8. Nila: antimony
    9. Kharva: cups or vessels baked in fire [See Wiki Link below]

Poetic Devices & Features

  1. Ocean of courage (साहस को सिंधु) and Makarand (Nectar) Siv (मकरंद सिव) are metaphors. Shivaji being the tenor in both cases. Ocean and Nectar being the vehicles. Further, Makarand is also a paronomasia, where it refers to nectar, as well as Shivaji’s grandfather (Maloji – Mal Makarand)
  2. Suman is a pun, or paronomasia, meaning a flower (सुमन) or a pure-mind (सु-मन).
  3. Saraja Subhat Saahinand, is an alliteration on the letter S.
  4. Verse has been written in a riddle-style, a rhetorical device, used to gain attention of the reader and create a sense of wonder, especially, given that this is the first verse.
  5. Writing poetry in exaggerated metre was a tradition of court poets. Use of hyperbole or auxesis, which is a key characteristic of poetry written in Veer-ras (वीर रस), is employed significantly in the verse.
The concept of a Ras (रस) is difficult to explain. It perhaps deserves its own post. Essentially Ras means juice or extract. It signifies the emotion or the sentiment being evoked in the audience when experiencing an artwork.
There are nine rasas:
  1. Śṛngāram (शृङ्गारं) Love, Attractiveness;
  2. Hāsyam (हास्यं) Laughter, Mirth, Comedy;
  3. Raudram (रौद्रं) Fury;
  4. Kāruṇyam (कारुण्यं) Compassion, Tragedy;
  5. Bībhatsam (बीभत्सं) Disgust, Aversion;
  6. Bhayānakam (भयानकं) Horror, Terror;
  7. Vīram (वीरं) Heroic mood;
  8. Adbhutam (अद्भुतं) Wonder, Amazement;
  9. Śāntam (शांतं) Peace or tranquility. [Via Wikipedia]
Ruddy shelduck, Brahminy duck, or Chakwa (चकवा, चक्रवाक). Chambal River, December 2015
A pair of Ruddy shelducks. Also called Brahminy duck, or Chakwa (चकवा, चक्रवाक). Chambal River, December 2015

संदर्भ / References

  1. पं॰ हरिशंकर शर्मा कविरत्न। शिवा-बावनी, टीका-टिप्पनी, अलंकार तथा प्रस्तावना सहित। आगरा: रामप्रसाद एण्ड ब्रदर्स
  2. आनन्द मिश्र ‘अभय’।। शिवा-बावनी, छत्रसाल दशक सहित। लकनऊ: लोकहित प्रकाशन। २०१२
  3. आचार्य विश्वनाथप्रसाद मिश्र। भूषण ग्रंथावली। नयी दिल्ली: वाणी प्रकाशन। २०१२।

Links

  1. https://en.wikipedia.org/wiki/Siddhi  (English)
  2. https://en.wikipedia.org/wiki/Nidhi  (English)
  3. http://aumamen.com/question/what-are-the-ashta-8-siddhis-and-nava-9-nidhis (English)
  4. http://kuchhalagsa.blogspot.in/2012/05/blog-post_29.html (हिन्दी)

Introduction: The Bhushan Project

Who was Bhushan?

One of the best poets, ever?

Kaviraj (King among Poets) Bhushan was born in Trivikrampur, (now Tikwapur) in Kanpur district, in Uttar Pradesh. His father, Ratnakarji, a poet himself, was a Kanyakubj Brahmin, who had four sons: Chintamani, Bhushan, Matiram, and Neelkanth (Jatashankar). That, all of Ratnakarji’s sons ended up being poets was a fortuitous event. We do not have exact details of Bhushan’s birth or death, however, according to Mishra Brothers, he was born around 1614 CE and died somewhere around 1714 CE. Yes, this grandmaster poet of medieval India, lived for over a hundred years!

We have no records of his full name, either. It is said that he was addressed as Kavi (poet) Bhushan by the son of the King of Chitrakoot, Rudraram, where the poet was in residence. Later, Bhushan, aged 54, reached the court of Chh. Shivaji in 1667 CE. (There is a difference of opinion between scholars about his life after he left Chitrakoot, but there’s a general agreement about his arrival in the Deccan.)

How he met Chh. Shivaji, is perhaps, an interesting highlight of Bhushan’s life.

The stories of Shivaji’s campaigns and his heroism were rapidly spreading through the country. After a tiff, if we can call it that, with Aurangzeb, Bhushan escaped from Agra, to meet Shivaji; perhaps, to find patronage there. (We will tell the Aurangzeb story when we get to the verses. Yes, there is poetry involved; would it be any other way!)

Bhushan was perhaps some distance from Raigad, where he must have halted for rest. There, a man enquired of his business in the region. Bhushan readily informed him of his purpose. This stranger, then coaxed him to give a flavour of what he would recite at court.

Little did Bhushan know that this curious stranger was Chh. Shivaji himself, in disguise.

After some coaxing, Bhushan recited this verse:

इन्द्रजिमि जम्भ पर बाड़व सुअम्भ पर, रावन सदम्भ पर रघुकुल राज है।
पौन बारि वाह पर संभु रति नाह पर, ज्यों सहस बाह पर राम द्विजराज है।।
दावा द्रुम दण्ड पर जीता मृग झुंड पर, भूषण वितुण्ड पर जैसे मृगराज है।
तेज तम अंस पर कान्ह जिमि कंस पर, त्यों मलिच्छ वंस पर सेर शिवराज है।।

This verse is a compilation of multiple imperfect similes (मालोपमा अलंकार). It talks of the dominion of one over the other — about ten of them, taken from mythology, history, nature, and philosophy — and at the end, states, that this is how Chh. Shivaji exercises his domain over the foreigners (Mughals).

This verse will have its own detailed article in the days to come.

Continuing with our story, the still-disguised Shivaji is, needless to say, impressed and asks the poet to repeat this verse. Again. And again. And again. The poet obliges, repeats it fifty-two times. After which the tired poet claims exhaustion and refuses to recite it another time.

At this moment, Shivaji discloses his identity and tells the poet that he was willing to give as many villages to the poet as many times he would have recited the verse, alas, only fifty-two villages were in the poet’s destiny. These 52 verses, which are perhaps the best examples of the use of Homeric simile (the closest, I could find to describe वीर-रस), are called the Shiv-Baavani. (Baavan is 52, in Hindi)

Some sources say that he recited 52 different verses of his much larger composition, the Shivraj-Bhushan, a collection of 442 verses. (Which does seem more believable). Some sources attribute only 18 recitations. None however, deny the event, itself.

In his lifetime, Kaviraj Bhushan composed many poetic works; three of them stand out – Shivraj Bhushan, Shiva-Baavani, and Chhatrasal Dashak. Most authorities agree that Shiva-Baavani is an extract of Shivraj Bhushan. Chhatrasal Dashak was written in praise of the Bundelkhand King Chhatrasal, and consists of ten verses (दशक).

Kaviraj Bhushan was a prolific poet and master of poetic devices. A majority of his poems are in the Homeric simile, and there is significant and masterful use of other figures of speech like the alliteration, metaphors, homonyms, puns, and (perhaps excessive) hyperbole. We also see a continuing use of religious references, legendary and mythical stories, as well as abundant natural metaphors.

Note: The above extract has been formed from various sources, and all the sources are listed below. Some of them are available for free, online, some are print books.

About the Project

Before we dive into the project, a few notes about this project for our kind readers. At this time, this is a project undertaken out of pure love and respect for the art and culture of the Indian subcontinent. We are not experts in poetry, so most of the work you see here is a labour of lots of love and research. There will be mistakes and omissions; none of them are careless or deliberate.

In the days to come, we will publish each verse of the Shiva-Baavani as a single article, move to Chhatrasal Dashak, and then take on Shivraj Bhushan. Stay tuned.

If you believe you can help, we welcome any kind of support. For more information, please see this invitation.

Actual words of Kaviraj Bhushan’s poems will differ from source to source. We are aware of that. When we refer to a source, it will be mentioned. We believe, that given the oral tradition of this art, there will be differences between various texts, because of who compiled it, at what time.

We are sensitive and receptive to corrections; please offer them kindly.

Acknowledgements

Shree Rajendra Chandrakant Rai, a wonderful teacher that we never had, for helping us understand the language, the structure, and the very beautiful translations, rendered with love and thoughtfulness.

Nayan Namdeo for helping with the invitation for this project as well as his encouragement, proof reading, and the book treasures that he has helped us with.

Shilpi Awasthi, a wonderful artist, for the artist’s impression of Kaviraj Bhushan, used as the featured image of this post.

References

  1. पं॰ हरिशंकर शर्मा कविरत्न, श्री छत्रसाल दशक, प्रकाशक, रामप्रसाद एण्ड ब्रदर्स, बुकसेलर्स, आगरा, १९२७
  2. आचार्य विश्वनाथप्रसाद मिश्र, भूषण ग्रंथावली, वाणी प्रकाशन, २०१२

आमंत्रण | Invitation

द कस्टोडिन्स, महाकवि भूषण की रचनाओं के डिजिटलीकरण, अनुवाद, एवं व्याख्यान की परियोजना शुरू करने जा रहे हैं। यदि आपको हिंदी काव्य के उचित ज्ञान के साथ-साथ कवी भूषण की रचनाओं की जानकारी है; यदि आप इन रचनाओं की साहित्यिक तथा ऐतिहासिक परिपेक्ष्य में व्याख्या करने में सक्षम हैं, तो आप इस परियोजना से जुड़ने के लिए आमंत्रित हैं। हम कुछ अन्य प्रकार के योगदान, जैसे कि हिंदी से अंग्रेजी में अनुवाद (या फिर अन्य भाषाओं में अनुवाद) अभिचित्रण, कला कृति, इत्यादि के रूप मैं भी योगदान का स्वागत करते हैं।

यह ऐसा कार्य है जो हमारे और आपके साहित्य के प्रति स्नेह कारण किया जा रहा है। हम सभी योगदानों को उचित श्रेय एवं साधुवाद देने का आश्वासन देते हैं, हांलाकि वर्तमान में हम किसी भी प्रकार का परिश्रामिक देने में सक्षम नहीं हैं।

हमसे जुड़ें

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The Custodians is starting a project of digitising, translating, and interpreting the works of Mahakavi Bhushan. If you have a good hold over Hindi poetry, understanding of Kavi Bhushan’s work, are able to interpret it from a poetic as well as historic perspective, offer contextual meaning, then we invite you to join this project. We also welcome contributions of other nature – translation from Hindi to English (and other languages), illustrations, artwork, etc.

This is a labour of love. We offer prominent and due credit to all contributors, however, we are, at present, unable to compensate commercially.

Please join us and help us share this message.

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